बिहार में विकास सम्बन्धी चुनौतियों को अवसरों में बदलना होगा नए सम्राट को

बिहार में विकास सम्बन्धी चुनौतियों को अवसरों में बदलना होगा नए सम्राट को

बिहार के नए सम्राट को फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों का ताज मिला है। चाहे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों, या पूर्व मुख्यमंत्री दम्पत्ति लालू प्रसाद और राबड़ी देवी, कभी भी चैन पूर्वक राज नहीं कर सके। लिहाजा, मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी उन जातीय और साम्प्रदायिक चुनौतियों से जूझना होगा, जो बिहार के विकास में शुरू से ही बाधक समझी गई हैं। लेकिन जिस प्रकार से आधुनिक बिहार के निर्माता और प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा को कांग्रेस के सहयोग से लंबे समय तक राज करते हुए जनसेवा का मौका मिला, वैसी ही मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भाजपा के सहयोग से जनसेवा का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा भी है कि पार्टी ने उन्हें पद नहीं, जनसेवा का अवसर दिया है, इसलिए विकास, सुशासन और समृद्धि उनके शासन का मूलमंत्र होगा।




बिहार के आर्थिक विश्लेषक बताते हैं कि बिहार के विकास में श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद नीतीश कुमार ने एक बड़ी रेखा खींचने की कोशिश की, प्रगति नजर भी आई, लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और हाल के वर्षों में उत्तरप्रदेश के विकास को देखा जाए तो अब भी बिहार के विकास में कई बड़ी बड़ी चुनौतियाँ बाकी हैं, जो आंकड़ों और राज्य की सामाजिक आर्थिक स्थिति को देखने पर साफ दिखती हैं। इसलिए भाजपा की सरकार के सुलझे हुए और समावेशी प्रवृति वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी बिहार के समग्र विकास के लिए निम्नलिखित चुनौतियों से जूझना होगा। लेकिन अपने मृदु स्वभाव से वे एक एक करके इनसे पार पा जाएंगे, ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास है।






पहला, निर्धनता, रोज़गार और मानव पूंजी के नजरिए से विकास

आंकड़े बताते हैं कि बिहार, भारत के सबसे कम आय वाले राज्यों में शुमार है, जहां गरीबी दर अभी भी काफ़ी ऊँची है और रोज़गार की गुणवत्ता कमज़ोर है। समझा जाता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश कम होने के कारण यहां की मानव पूंजी कमज़ोर है- साक्षरता और स्किल लेवल अभी भी देश के स्तर से काफी नीचे हैं, जिससे युवाओं को अच्छे रोज़गार के अवसर मिलने में दिक्कत होती है। ऐसे में यदि अपराध, जातीय सोच और सांप्रदायिक मिजाज को हतोत्साहित करके इन लक्ष्यों को पाया जा सकता है। इसके लिए अप्रवासी बिहारियों और बिहार मूल के एनआरआई को आकर्षित करने वाली योजनाओं को बनाना होगा और उनपर दृढ़तापूर्वक अमल करना होगा।





दूसरा, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता के चलते उत्पादकता बढ़ाने पर देना होगा ध्यान

यद्यपि हार की आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन उत्पादकता और आय दोनों ही अपेक्षाकृत कम हैं। ऐसा इसलिए कि उत्तर बिहार 4 महीना बाढ़ से आक्रांत रहता है और तभी दक्षिण बिहार सूखा से जूझ रहा होता है। खेती और बागवानी यहां पर होती तो है, लेकिन भंडारण सुविधाएँ, बाढ़ प्रबंधन, सिंचाई व्यवस्था, जलवायु परिवर्तन और बारहमासी सिंचाई की सीमित पहुँच जैसे कारकों के कारण कृषि अभी भी बहुत जोखिम भरी और कम लाभ वाली काम साबित होती है। लिहाजा किसानों और मजदूरों के बच्चे परदेश कमाने चले जाते हैं और अपनी उद्यमिता से सबको सुख पहुंचाते हैं।





तीसरा, औद्योगिक विकास और निवेश की दिक्कत सबसे बड़ी अड़चन

बिहार में 26 साल पहले हुए राज्य विभाजन के बाद औद्योगिक आधार छोटा हुआ है, क्योंकि अधिकांश बड़े उद्योग-धंधे झारखंड के हिस्से में चले गए। ततपश्चात छोटे और कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, कृषि आधारित उद्योग तकनीकी पिछड़ेपन और वित्तीय अभाव के कारण इनका समग्र विस्तार नहीं हो पा रहे हैं। इस स्थिति को बदलना होगा। इस कारण और निजी निवेश की दृष्टि से बिहार अभी भी निवेश अनुकूल राज्यों की पहली पंक्ति में नहीं है, बल्कि तेज़ी के साथ उद्योग बढ़ाने की चुनौती बरकरार है। ऐसे में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और राज्य नेतृत्व को चाहिए कि वह महाराष्ट्र और गुजरात की तर्ज पर बिहार-उत्तरप्रदेश में औद्योगिक विकास की गति तेज करे, क्योंकि इन दोनों राज्यों में औद्योगिक रफ्तार तेज होने से लुक ईस्ट की विदेश नीति को मज

बूत आधार मिलेगा।






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