नई दिल्ली:जेल अपवाद है,जमानत देना नियम, बेल के लिए कठोर शर्तें,इसे नहीं देने के बराबर, जानें SC ने ऐसा क्यों कहा

नई दिल्ली:जेल अपवाद है,जमानत देना नियम, बेल के लिए कठोर शर्तें,इसे नहीं देने के बराबर, जानें SC ने ऐसा क्यों कहा

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक टिप्पणी में कहा कि जमानत के लिए ‘कठोर और अत्यधिक शर्तें’ जमानत से इनकार करने के बराबर हैं. शीर्ष अदालत ने ऐसी शर्तें लगाने की प्रथा को अस्वीकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप अभियुक्तों को जमानत नहीं मिल पाती और उन्हें मजबूरन जेल में रहना पड़ता है. द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि शर्तें पूरी न कर पाने के कारण आरोपी सितंबर में जमानत मिलने के बावजूद जेल में रहा, हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और जमानत की शर्तें हटा दीं. जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस वी रामासुब्रमण्यन की पीठ ने कहा कि जेल अपवाद है और जमानत देना नियम है, और ऐसे में जमानत पर लगाई गई शर्तें अनुचित नहीं होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा पारित एक आदेश से असहमति जताई, जिसमें एक अभियुक्त को हत्या के प्रयास में जमानत लेने के लिए 1 लाख रुपये का जुर्माना और इतनी ही राशि का निजी मुचलका और 50-50 हजार रुपये के 2 बेल बांड जमा करने का निर्देश दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि हाईकोर्ट की ओर से अभियुक्त को जमानत देने के लिए लगाई गई शर्तें बहुत कठिन थीं, जिसके परिणामस्वरूप वह इन शर्तों का पालन करने में विफल रहा. शीर्ष अदालत ने कहा, ‘इस समय इसी तरह की परिस्थिति में कोई अन्य आरोपी हिरासत में नहीं होगा. हालांकि, वर्तमान अपीलकर्ता, लगाई गई शर्तों के कारण जेल से बाहर नहीं निकल पाया है.’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘क्या अत्यधिक आवश्यकताओं का पालन करने में सक्षम नहीं होने के कारण अपीलकर्ता को अंतहीन हिरासत में रखा जा सकता है? अपीलकर्ता को जेल में रखना, वह भी ऐसे मामले में जहां कथित अपराधों के लिए उसे आम तौर पर जमानत मिल जाती, यह सिर्फ अन्याय का लक्षण नहीं है, बल्कि खुद अन्याय है.’ यह देखते हुए कि शर्तें पूरी न कर पाने के कारण आरोपी सितंबर में जमानत मिलने के बावजूद जेल में रहा, सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश में संशोधन किया और जमानत की शर्तों को हटा दिया. सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘हम उच्च न्यायालय द्वारा ज़मानत की अत्यधिक शर्तों की सराहना करने में असमर्थ हैं.’

अपनी टिप्पणी में शीर्ष अदालत ने कहा, ‘तथ्य यह है कि अपीलकर्ता को जमानत दे दी गई है, यह दिखाने के लिए पर्याप्त सबूत है कि वह मामले के लंबित रहने के दौरान जेल में सड़ रहा है. जबकि अपीलकर्ता को जमानत दे दी गई है, अत्यधिक लगाई गई शर्तों ने, वास्तव में उसे जमानत देने से इंनकार करने के रूप में कार्य किया है. अगर अपीलकर्ता ने आवश्यक राशि का भुगतान कर दिया होता, तो यह एक अलग मामला होता. हालांकि, तथ्य यह है कि वह अब भी जेल में बंद है. यह पर्याप्त संकेत है कि वह राशि का भुगतान करने में सक्षम नहीं था.’ पीठ ने शीर्ष अदालत के विभिन्न फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि जमानत की शर्तें इतनी कठिन नहीं हो सकतीं.

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