क्यों होती हैं सरकारें ऐसी:समाज ही विरोध कर रहा है तो सरकार सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल बनाने पर क्यों है तुली

 क्यों होती हैं सरकारें ऐसी:समाज ही विरोध कर रहा है तो सरकार सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल बनाने पर क्यों है तुली

पिछला वर्ष पूरी तरह अब पीछे छूट चुका है। छोड़ना ही पड़ता है। मजबूरी है। वजह साफ़ है। दरअसल, यादें हमारी तरह ज़िंदा नहीं होतीं। अगर होतीं तो हम उन्हें बुलाते। पास बैठाते और गपशप करते रूबरू। हो सकता है यही करते रहते। ख़ैर, नया साल शुरु हो चुका है। समय है। आता- जाता रहता है। इसकी शक्ल नहीं बदलती। बदलती भी है तो इतनी जितना फ़र्क़ हमें 2022 और 2023 की शक्ल में नज़र आता है। बस।

पिछले साल से नए साल में अगर कोई सबसे बड़ा मुद्दा जा रहा है तो वह है सम्मेद शिखर का मुद्दा। सम्मेद शिखर झारखण्ड राज्य में मौजूद है और जैन समाज का बड़ा तीर्थस्थल है। सरकारें जाने कहाँ से आईं हैं और कैसा सोचती हैं, समझ में नहीं आता। कहा तो यही जाता है कि वे निष्पक्ष होती हैं और सभी धर्मों का समान सम्मान करती हैं। सभी धर्मों को समान रूप से देखती हैं। फिर इन सरकारों को ऐसा क्या हो जाता है कि वे लोगों की भावनाओं के खिलाफ निर्णय लेने में जरा भी हिचकिचाती नहीं।

झारखण्ड सरकार ने इस पवित्र जैन तीर्थ को पर्यटन स्थल घोषित कर दिया है। समूचा जैन समाज इसका विरोध कर रहा है। विरोध की वजह साफ़ समझ में आती है। तीर्थस्थल के सौ- दो सौ मीटर के दायरे में ही शराब और मांस बिक रहा है। ज़ाहिर है तीर्थस्थल की पवित्रता पर आँच तो आती ही है। जब इस तीर्थस्थल को मानने वाले, इसमें श्रद्धा रखने वाले लोग ही सरकार के निर्णय का विरोध कर रहे हैं तो सरकार इसे पर्यटन स्थल बनाने पर क्यों तुली हुई है?

सवाल ये भी उठता है कि क्या राज्य सरकार ने ऐसा निर्णय लेने से पहले जैन समाज से पूछा? या ऐसा कोई सर्वे करवाया जिसमें आया हो की नब्बे, पिंचानवे प्रतिशत जैनों ने कहा हो कि हाँ, बना दीजिए सम्मेद शिखर को पर्यटन स्थल। हमें कोई आपत्ति नहीं हैं। दरअसल, सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। क्यों? किसी को नहीं पता। वास्तव में सरकारें होती ही ऐसी हैं। उन्हें किसी से भावनात्मक लगाव होता ही नहीं। इसलिए लोगों की भावनाओं से खेलने का उन्हें मानो लाइसेंस मिल जाता है।

जैसा किसानों के मामले में हुआ था। केंद्र सरकार लाई थी तीन नए कृषि विधेयक। कहा यह जा रहा था कि ये किसानों के हित में हैं। हो सकता है वे हों भी। लेकिन जब किसान ही उन्हें अपने हित में नहीं मानते, तो आप ये विधेयक उन पर थोपने वाले कौन हैं? हालाँकि देर- सबेर ही सही, केंद्र सरकार ने यह बात समझ ली और विधेयक वापस ले लिए। झारखण्ड सरकार को यह बात कब समझ में आएगी, फ़िलहाल तो समझ से परे है। तीर्थ स्थल की पवित्रता बनाए रखना सरकार का पहला धर्म होना चाहिए।

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