पायलट के बयान से फिर बढ़ी सियासी गर्मी

पायलट के बयान से फिर बढ़ी सियासी गर्मी

आमतौर पर विवादित बयानों से बचने वाले सचिन पायलट ने बुधवार को बयान देकर राजनीतिक बम फोड़ दिया। उनका बयान ऐसे समय में आया है जब राजस्थान में सियासी संकट चरम पर है। 25 सितम्बर को राजस्थान में हुई इस्तीफा पॉलिटिक्स के बाद से 36 दिन बाद पहली बार पायलट ने सीधे तौर पर उस घटनाक्रम को लेकर कुछ बोला है। वहीं सीएम अशोक गहलोत पर भी पहली बार उन्होंने सीधा अटैक किया है।


पायलट के बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में इसके मायने तलाशे जा रहे हैं। कुछ इसे पायलट का अशोक गहलोत गुट को कटघरे में खड़ा करने और हाईकमान को 25 सितम्बर के घटनाक्रम पर प्रेशर पॉलिटिक्स के रूप में देख रहे हैं। वहीं कुछ लोगों का यह भी मानना है कि हाईकमान के इशारे पर या संरक्षण में पायलट ने यह बयान दिया है। इस बयान को पायलट को राजस्थान में मिलने वाली नई भूमिका के तौर पर देखा जा रहा है।


गहलोत का अध्यक्ष के लिए नाम आने से शुरू हुआ घटनाक्रम


बयानों के पीछे वास्तविकता जो भी हो मगर इन बयानों से प्रदेश में लगातार राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना रहा है। राजस्थान में सियासी पारा एक बार फिर तब से चढ़ने लगा जब अशोक गहलोत का नाम कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए सामने आया। गहलोत का नाम सामने आने के बाद से ही राजस्थान में नए मुख्यमंत्री को लेकर सियासी चर्चाएं शुरू हो गई। हर रोज नए-नए बयानों से राजस्थान में सियासी पारा चढ़ता-उतरता रहा। इस पूरे घटनाक्रम में नेताओं के बयानों ने इस पारे को चढ़ाने-उतारने में बड़ा रोल अदा किया। जानते हैं कैसे नेताओं के बयान राजस्थान में किस तरह राजनीतिक उथल-पुथल मचाते रहे।


पायलट ने क्यों दिया इस तरह का बयान ?


राजनीतिक जानकारों और पायलट के करीबी लोगों का कहना है कि सचिन पायलट ने यह बयान उन आरोपों के जवाब में दिया है जो उनपर 2020 में लगाए जाते थे। 2020 में मानेसर एपिसोड के बाद बीजेपी या आरएलपी के नेता जब सचिन पायलट को 2018 में सरकार बनाने का क्रेडिट देते थे तब गहलोत गुट की ओर से लगातार इन बयानों को बीजेपी से करीबी के तौर पर बताया जाता था। ऐसे में अब जब पीएम नरेंद्र मोदी ने सीएम गहलोत की तारीफ की तो उसी अंदाज में पायलट ने उनपर भी हमला किया।


राजस्थान, जोधपुर, महामंदिर से दूर नहीं


सीएम अशोक गहलोत लगातार यह बयान देते रहे हैं कि वे कभी भी राजस्थान से दूर नहीं होंगे। कांग्रेस अध्यक्ष बनने से पहले भी गहलोत ने यह बयान दिए थे। वहीं 25 सितम्बर को हुई प्रेशर पॉलिटिक्स के बाद दिल्ली से वापस लौटने पर भी गहलोत ने राजस्थान में अलग-अलग जगहों पर यह बयान दिए कि वे कहीं भी हों मगर राजस्थान, जोधपुर और महामंदिर से दूर नहीं होंगे। अशोक गहलोत के इस बयान को किसी भी कीमत पर गहलोत के राजस्थान नहीं छोड़ने को लेकर देखा गया। गहलोत के इन बयानों से ये लगा कि गहलोत मजबूत हैं और राजस्थान में बदलाव होना मुश्किल लगता है।


राहुल गांधी का गहलोत के कामों की तारीफ करना


प्रेशर पॉलिटिक्स के एपिसोड के बाद राहुल गांधी ने दो बार अशोक गहलोत के काम का समर्थन किया। पहले इनवेस्टर समिट में गौतम अडानी को आमंत्रित करने पर सवाल उठे तक राहुल ने उस कदम का सशर्त समर्थन किया। वहीं कुछ दिनों पहले ही गुजरात चुनाव में राजस्थान की संविदाकर्मियों को स्थाई करने और ओल्ड पैंशन स्कीम को भी लागू करने की बात कही। राहुल गांधी की इन बातों को इस तौर पर देखा गया कि गुजरात चुनाव तक राजस्थान में गहलोत की कुर्सी को कोई खतरा नहीं है।


जब गहलोत ने लिया जय शाह का नाम


इनवेस्टर समिट के दौरान जब बीजेपी ने उद्योगपति गौतम अडानी को बुलाए जाने पर तंज कसा तो गहलोत ने बयान दिया कि चाहे गौतम अडानी हो या अमित शाह के बेटे जय शाह, राजस्थान में जो भी निवेश करेगा हम उसका स्वागत करेंगे। गहलोत के इस बयान के भी कई मायने निकाले गए। गहलोत विरोधियों ने यह तक कहा कि जय शाह कोई बड़े उद्योगपति नहीं है इसके बाद भी उनका नाम लेना गहलोत का हाईकमान को संकेत है।


डोटासरा का तटस्थ होना और खाचरियावास की मुलाकात


सियासी संकट से पहले तक गहलोत के खुले तौर पर समर्थक रहे गोविंद सिंह डोटासरा 25 सितम्बर के बाद पूरी तरह तटस्थ नजर आए। उन्होंने ना ही कोई बयानबाजी की ना ही किसी खेमे का समर्थन किया। डोटासरा ने यह बताने की कोशिश की है कि वे हाईकमान के अनुसार चल रहे हैं। इसी तरह पायलट ने खाचरियावास से मुलाकात की। मुलाकात के बाद बयान भी दिया कि पायलट क्या घर आकर गप्पे नहीं ठोक सकते। इन बदलावों के बाद एक बार फिर राजस्थान में यह माना गया कि सियासी झुकाव सचिन पायलट की ओर है।


गुढ़ा-दिव्या का विरोध और बयानबाजी


इधर सियासी संकट के बाद से ही लगातार मंत्री राजेंद्र गुढ़ा और विधायक दिव्या मदेरणा गहलोत गुट के नेताओं को घेरते रहे हैं। राजेंद्र गुढ़ा जहां लगातार सचिन पायलट को जनता की पहली पसंद बताते रहे। वहीं दूसरी ओर दिव्या मदेरणा शांति धारीवाल, धर्मेद्र राठौड़ और महेश जोशी पर लगातार हमलावर रही। 2020 में गहलोत के समर्थक रहे गुढ़ा के सचिन पायलट का समर्थन भी इसी रूप में देखा गया कि सचिन पायलट अब कांग्रेस में मजबूत हैं।

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